विरह-माधुरी · पद 186
सखी! यह, बड़ अचरज मोहिं आवत।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! yaha, bad̤a acharaja mohiṁ āvata
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! यह, बड़ अचरज मोहिं आवत।
2रसिकन पिया-मिलनहूँ सो अति, मधुर वियोग बतावत।
3मोरे मत यह दंत-कथा सब, जरे लोन भुरकावत।
4विरहानल सों दावानलहूँ, अति लघु अनल जनावत।
5न तु कत मृत पिय देखि समुद तिय, आपुन देह जरावत।
6यह “कृपालु” कछु अकथ कहानी, अनुभव-गम्य लखावत॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि हे सखी! रसिक लोग प्रियतम के वियोग की मधुरता को मधुर-मिलन की मधुरता से भी अत्यन्त मधुर बतलाते हैं, यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य होता है। मेरे दृष्टिकोण से तो यह रसिकों का वाक्य व्यंग्य रूप से विरहिणियों के जले पर नमक लगाने के लिए ही है। मैं तो ऐसा समझती हूँ कि लोक में ट में होता है। इसका प्रमाण यह है कि यदि ऐसा न होता तो सती स्त्री अपने पत्ति के मरने पर विरह की आग से डरकर सहर्ष स्थूल आग में जलकर अपने सतीत्व का परिचय क्यों देती? 'कृपालु' कहते हैं कि यह बात कहने-सुनने समझने समझाने की नहीं है। यह तो केवल अपने ऊपर बीतने की ही है, जिसे केबल विरहिणी का अनुभूत हृदय ही जानता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 857-858