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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 185

सखी! मोहिं, होत न अस विश्वास।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! mohiṁ, hota na asa vishvāsa

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी! मोहिं, होत न अस विश्वास।

2जिन राधे-रानी सँग निशि-दिन, कीनो रास-विलास।

3तिनहुँ सुरति बिसराय दियो पिय, जाय कूबरिहिं पास।

4जिन श्रीदामादिक सँग किय नित, विविध हास-परिहास।

5जिन बछरन सँग पियो सुरभि-थन, निज कर दिय गो ग्रास।

6तिन “कृपालु” हरि बिसरि सकत कत, पाय मधुपुरी वास॥

हिन्दी भावार्थ

(श्यामसुन्दर के मथुरा-गमन के पश्चात् गोपियों को परस्पर उक्ति) अरी सखि! मुझे यह विश्वास नहीं होता कि जिन राधारानी के साथ दिन-रात श्यामसुन्दर ने रास-विलास किया, कुब्जा के पास जाकर उनकी भी याद भुला देंगे। जिन श्रीदामादिक सखाओं के साथ नित्य अनेक प्रकार के हास-परिहास किये एवं जिन बछड़ों के साथ गायों के थन पिये तथा अपने हाथ से जिन गायों को ग्रास दिया, 'कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर मथुरा जाकर उन सब को भूल सकते हैं, यह परमाश््चर्यमय है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 856-857