विरह-माधुरी · पद 184
सखी! मोय, भयो विधाता बाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! mohiṁ, bhayeu bidhātā bāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! मोय, भयो विधाता बाम।
2परसों कहि बरसों तरसाये, नहिं आये घनश्याम।
3कोसति रहीं विधातहिं हम सब, पलकन हित नित बाम।
4सोइ रिसियाय हाय! जनु दीनो, विरह हमहिं वसुयाम।
5जो यह साँचु, क्षमा माँगत हम, परत विधातहिं पाम।
6माँगत भीख “कृपालु” इहै विधि, विधि पद रज ब्रज धाम॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि अरी सखि! हम लोगों पर विधाता की वक्र-दृष्टि हो गयी है। अरी सखि! देख परसों आने के लिये कह गये थे किन्तु बरसों तरसाने पर भी श्यामसुन्दर नहीं आये। हम लोग उनके मधुर मिलन के समय ब्रह्मा को कोसा करते थे कि इस ब्रह्मा ने आँखों में पलक क्यों बनाये। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि इसी से ब्रह्य ने क्रुद्ध होकर हम लोगों को श्यामसुन्दर का वियोग दे दिया है। यदि यह सच है तो हम लोग उस ब्रह्मा से पैर छूकर क्षमा माँगते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि ये ब्रजांगनायें उसी ब्रह्मा से क्षमा माँग रही हैं जो इन्हीं सखियों की चरण धूलि को पाने के लिये भिखारी का भेष बनाकर निहोरा करता रहता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 856