# सखी! हम, इन पाँचन ते हारे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0945-M19-K194
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 194
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 437–438

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! हम, इन पाँचन ते हारे।  
<a id="line-2"></a>लोचन लखन कमल-लोचन चह, निशि दिन बहत पनारे।  
<a id="line-3"></a>रसना श्याम-नाम-रस-चाखन, हित नित पियहिं पुकारे।  
<a id="line-4"></a>दिव्य सुगन्ध हेतु जनु नासा, दीरघ श्वास निकारे।  
<a id="line-5"></a>सुधा-मधुर-मधु पिय मुख वानी, सुनन श्रवन हठ धारे।  
<a id="line-6"></a>रोम रोम चह परस पिया को, स्वेद कंप विस्तारे।  
<a id="line-7"></a>अब “कृपालु” की कौन सुने जब, पंच एक मत वारे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी अपनी सखी से कहती है कि अरी सखी! मैं तो इन पाँचों जञनेन्द्रियों से हार चुकी। नेत्र कमलनयन श्यामसुन्दर को देखने के लिए दिन-रात आँसुओं के पनारे बहाया करते हैं। रसना निरंतर ही श्याम नाम का वास्तविक दिव्य रसास्वादन करने के लिए प्रियतम को ही पुकारा करती है। नाक प्रियतम की चिन्मय देह की दिव्य सुगन्ध के लिए ही मानो लम्बी-लम्बी साँसें निकालती रहती है और कान अमृत से भी अत्यन्त मधुर प्रियतम के मुख की वाणी सुनने के हेतु हठपूर्वक अड़े हुए हैं। मेरे शरीर का रोम-रोम प्रियतम के स्पर्श हेतु स्वेद बहाता तथा कम्पन पैदा करता है। 'कृपालु' कहते हैं अब मेरी भला कौन सुनेगा, जब ये पाँच ज्ञानेन्द्रिय रूपी पंच एकमत वाले हैं। कलियुग में तो बहुमत ही माना जाता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 864-865

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
