# सताये, शशि सिगरी निशि हाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0946-M19-K195
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 195
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 438–438

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सताये, शशि सिगरी निशि हाय।  
<a id="line-2"></a>रत्नाकर-कुल-कानि आनि तजि, शिव-सिर थितिहिं लजाय।  
<a id="line-3"></a>विरहिनि-वध-कुकलंक अंक धरि, निशि मयंक मुसकाय।  
<a id="line-4"></a>करत कुमुदिनी तप जल बिच जो, तेहि शठ दूरि बसाय।  
<a id="line-5"></a>कोटि-हलाहल गरल उग्रतर, शशि विष मोहिं जनाय।  
<a id="line-6"></a>ताही सों “कृपालु” डरि शंकर, शशि निज शीश चढ़ाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी चन्द्रमा को कोसती हुई कहती है कि हाय! हाय!! यह चन्द्रमा तो मुझे सारी रात दुःख देने पर तुला हुआ है और मुझे जला रहा है। संसार में दुष्टता या तो कुल परम्परा से होती है या संग से होती है किन्तु इस चन्द्रमा का तो कुल भी रत्नाकर अर्थात् समुद्र है और इसका संग भी भगवान शंकर का ललाट है, फिर ऐसा जलाने का कुत्सित कार्य क्यो करता है? यह चन्द्रमा ऐसा निर्लज्ज है कि विरहिणियों की हत्या कलंक कालिमा-रूप से अपने हृदय में रखकर रात में समस्त संसार के समक्ष मुस्कराता है एवं उसकी प्रेमिका कुमुदिनी जो उसके लिए निरंतर जल में निमग्न होकर तपस्या करती है उसको उस दुष्ट ने अपने से बहुत दूर कर रखा है। मेरी समझ से तो चन्द्रमा के विष का ताप शंकरजी के द्वारा पिये हुए हलाहल से भी अत्यन्त तेज है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 865

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
