# सुनी इन, कानन जब ते तान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0949-M19-K198
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 198
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 439–439

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सुनी इन, कानन जब ते तान।  
<a id="line-2"></a>तब ते बिसरि गई सुधि सिगरी, कान करैं सखि! का न?।  
<a id="line-3"></a>अब सो तान सुरीली मुरलिहिं, छुटत न कैसेहुँ ध्यान।  
<a id="line-4"></a>अब सो ध्यान जरावत हमरो, सिगरो तन, मन, प्रान।  
<a id="line-5"></a>अब सो प्रान पयान करन चह, रह्यो न कछु मोहिं भान।  
<a id="line-6"></a>अब “कृपालु” सोइ भान रहत इक, सुनहुँ तान नहिं आन॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि अरी सखि! जब से इन कानों ने श्यामसुन्दर की सुरीली तान सुनी है तब से मुझे कोई सुधि नहीं है। ये कान जो न करें वह थोड़ा है। अरी सखि! अब तो उस मुरली की तान का ध्यान एक क्षण के लिए भी नहीं हटता एवं तान का ध्यान रहने के कारण विरह में मेरा तन, मन, प्रान सभी जल रहा है और कहाँ तक कहूँ अब मेरा प्राण निकलना चाहता है। मुझे कुछ भी होश नहीं है। 'कृपालु के शब्दों में मुझे एक ही होश है कि वह तान फिर कब सुनूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 867

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
