# हाय मोरा, पिया बिनु जिया घबराये।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0959-M19-K208
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 208
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 443–444

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हाय मोरा, पिया बिनु जिया घबराये।  
<a id="line-2"></a>बरसों बीत गये गये घर सों, परसों कितक विहाये।  
<a id="line-3"></a>कहँ लौं मन समुझाउँ सखी अब, मनहूँ भये पराये।  
<a id="line-4"></a>सुधा समान बैन सखियन के, विष सम मोहिं जनाये।  
<a id="line-5"></a>छिन आँगन छिन बाहर भाजति, कितहूँ चैन न आये।  
<a id="line-6"></a>कबहूँ तो “कृपालु” पिय हियहूँ,"हाय!"लगेगी जाये॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(जब श्यामसुन्दर गोपियों को छोड़कर मथुरा चले गये तब एक विरहिणी अपनी विरह-व्यथा को अपनी अन्तरंग सखी से बताती है।) हाय! सखी! मेरा मन प्रियतम श्यामसुन्दर के बिना अत्यन्त ही घबरा रहा है। अरी सखी! उन्होंने कहा था कि परसों ही आ जायेंगे किन्तु बरसों बीत गये उनका अभी तक परसों नहीं समाप्त हुआ। अरी सखी! अपने मन को किस प्रकार एवं कहाँ तक समझाऊँ और अगर समझाऊँ भी तो वह भी तो उन्हीं के पास चला गया है, फिर हमारी बात मन समझ कैसे सकता है? मेरी परम अन्तरंग सखियों के अमृततुल्य मीठे बचन भी मुझे विष के समान प्रतीत हो रहे हैं। मैं क्षण-क्षण में खाद घर में आती हूँ कभी "प्रियतम आते होंगे ', इस आशा में भागती हुई घर के बाहर जाती हूँ किन्तु कहीं भी चैन नहीं मिलता। "कृपालु कहते हैं कि अरी विरहिणी। तू घबरा मत कभी तो प्यारे श्यामसुन्दर के हृदय में तेरी यह 'हाय! हाय! की ध्वनि अवश्य ही प्रभाव डालेगी एवं उन्हें विवश होकर आना पड़ेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 875-876

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
