# हाय! मोहिं पल छिन विरह सतावत।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0960-M19-K209
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 209
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 444–444

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हाय! मोहिं पल छिन विरह सतावत।  
<a id="line-2"></a>जब विरहा लै अगिनि-बान मोहिं, रोम-रोम तकि मारि जरावत।  
<a id="line-3"></a>तब हौं विरहिणिवरुण-अस्त्र लै, भरिलोचन-जलताहि बुझावत।  
<a id="line-4"></a>पुनि विरहा रिसियाय हाय जब, वारिद-वृंद बान लै धावत।  
<a id="line-5"></a>तब दीरघ-निःश्वास पवन सों, बेगि धाय हौं मारि भजावत।  
<a id="line-6"></a>पुनि विरहा ऋतुराज-साज लै, त्रिविध-समीरन बान चलावत।  
<a id="line-7"></a>तब हौं निज उर धारि मृणालन, नागबान लै प्रान बचावत।  
<a id="line-8"></a>इमि रन करत भूमि-तनु मधि नित, प्रान धरोहर जान न पावत।  
<a id="line-9"></a>अब “कृपालु” पिय वेगि बचाइय, नहिं तो विरह कलंक लगावत॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक विरहिणी का दिव्य बाणं द्वारा विरह से घोर विरहिणी कहती है कि हाय! हाय!! मुझे निरन्तर ही प्रियतम यामसुंदर का वियोग सता रहा है। जब विरह अग्निबाण नेकर मेरे रोम-रोम में प्रहार करता हुआ मुझे जलाता है तब मैं मँखों से जल बरसाती हुई मानो वरुण-अस्त्र से अग्निबाण नि शान्त कर देती हूँ। पराजित विरह फिर क्रुद्ध होकर अन्यायपूर्ण ग्ध नीति से बादलों के समूह रूपी बाणों से प्रहार करता है ब मैं अपनी सांसों रूपी पवनास्त्र से शीघ्र ही उसे शान्त कर तन हूँ। फिर विरह वसन्त ऋतु को साथ लेकर शीतल मंद सुगन्धित-वायु-रूपी बाण से प्रहार करता है, तब मैं अपने वक्षःस्थल पर कमल के नालरूपी नागबाण से अपना प्राण बचाती हूँ। इस प्रकार प्रियतम की धरोहर-रूप प्राण के लिए इस शरीर रूपी रणक्षेत्र में मैं सदा ही युद्ध करती रहती हूँ किन्त कृपालु' कहते हैं कि हे प्रियतम! अब आप शीघ्र ही आकर अपनी धरोहर की रक्षा कीजिए नहीं तो विरह प्राण ले जाएगा एवं मुझ पर धरोहर मी रक्षा न कर सकने का बड़ा भारी कलंक का टीका लग जाएगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 876-877

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
