# हाय! सखि, कैसे ह्वै गये श्याम।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0963-M19-K212
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 212
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 445–446

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हाय! सखि, कैसे ह्वै गये श्याम।  
<a id="line-2"></a>जो आधे-पलहूँ नहिं रहि सक, बिनु राधे इक ठाम।  
<a id="line-3"></a>सो ऐसे बेपीर भये कस, वीर! तज्यो ब्रजबाम।  
<a id="line-4"></a>तजि देइहैं पिय प्रीति-रीति अस, होति प्रतीति न नाम।  
<a id="line-5"></a>हौं भल जान न मान सखी यह, चैन कान्ह उर धाम।  
<a id="line-6"></a>होत “कृपालु” कबहुँ उर संशय, हरि हैं आत्माराम॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(श्यामसुन्दर के वियोग में गोपियों का विलाप-) हाय सखि! श्यामसुन्दर अब कैसे हो गये हैं? जो किशोरी जी के बिना आधे क्षण में ही बेचैन हो जाते थे, वे ऐसे निष्ठुर कैसे हो गये जो किशोरी जी सहित समस्त ब्रजांगनाओं का परित्याग कर दिया? प्रियतम प्रीति की रीति को इस प्रकार त्याग देंगे, यह विश्वास नाम-मात्र को भी नहीं होता। अरी सखि! मैं भली-भाँति जानती हूँ, अतएव यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि श्यामसुन्दर चैन से होंगे'"। 'कृपालु' कहते हैं कि फिर भी कभी-कभी हृदय में यह शंका हो जाती है कि श्यामसुन्दर तो आत्माराम हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 878-879

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
