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RADHEY RADHEY

रसिया-माधुरी · पद 3

आयो ब्रज, रस बेचन-वारो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āyo braja, rasa bechana-vāro

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1आयो ब्रज, रस बेचन-वारो।

2जो रस निगमागमहुँ अगम सोइ, देत वनचरिन कहँ कारो।

3जा ब्रज-रस हित शुक सनकादिक, लतन पतन तन करि डारो।

4सो रस अस जेहि लगि शिव-शंकर, नर ते नारी तनु धारो।

5सो रस पियत सोइ जो वाको, निज तन मन प्रानन हारो।

6सो रस अस “कृपालु” छिन छिन बढ़, रस बैकुंठ लगत खारो॥

हिन्दी भावार्थ

एक परमहँस कहता है कि यह परम सौभाग्य की बात है कि ब्रज में आनन्द के भी सार-तत्व ब्रज-रस को बेचने वाला अवतार लेकर आ गया है। जो ब्रजरस वेदों शास्त्रों से भी अप्राप्य है उसे नन्दलाल वन में रहने वाली अशिक्षित स्त्रियों को दे रहा है। जिस ब्रजरस की प्राप्ति के हेतु व सनकादिक परमहँस वृक्ष बनकर ब्रज में अवतरित हुए हैं, जिस ब्रजरस के हेतु भगवान् शंकर ने अर्धनारी-नटेशवर का भेष बना डाला है, वह ब्रजरस वही प्राप्त कर सकता है जो मूल्य में अपना तन-मन-प्राण श्यामसुन्दर को समर्पित कर देता है। कृपालु' कहते हैं कि वह ब्रजरस प्रतिक्षण सरलता से वृद्धि को प्राप्त होता है एवं ऐश्वर्यलोकीय-भगवद्धाम बैकुंठ का सुख भी उस ब्रजरस के आगे नगण्य हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 886-887