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RADHEY RADHEY

रसिया-माधुरी · पद 4

ऐसो प्रेम बढ्यो ब्रजवासिन, जामें ब्रह्म रह्यो भरमाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aiso prema baḍhyo brajavāsina, jāmeṁ brahma rahyo bharamāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऐसो प्रेम बढ्यो ब्रजवासिन, जामें ब्रह्म रह्यो भरमाय।

2विप्रन विधिवत यज्ञ करावत।

3वैदिक-मंत्रन ब्रह्म बुलावत।

4तहँ न जाय टुक भोग लगावत।

5पै उन पनिहारिनि निदरतहूँ, चोरि-चोरि दधि खाय।

6देववृन्द विरदावलि गावत।

7अगनित गुनगन गाइ सुनावत।

8सो सुनि सपनेहुँ नहिं मन भावत।

9पै उन ब्रजनारिन गारिन सुनि, लोट-पोट ह्वै जाय।

10योगी परमात्महिं नित ध्यावत।

11ज्ञानी ब्रह्म ध्यान हरषावत।

12तिन इन बात करन नहिं भावत।

13पै उन ब्रज-बनितनि बछरन ते, बात करत तुतराय।

14शुक सनकादिक ध्यान लगावत।

15ध्यान लगाय समाधि बुलावत।

16तहँ जावन महँ मनहुँ लजावत।

17पै “कृपालु” उन श्यामा जू को, जाय पलोटत पाय॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रजवासियों का प्रेम इतना बढ़ गया कि उसमें सर्वसमर्थ ब्रह्म भी डूब गया। जिस ब्रह्म को पण्डित लोग विधिवत् महायज्ञो में वैदिक मन्त्रों से बुलाते हैं फिर भी वहाँ जाकर थोड़ा सा भोग नहीं लगाता, वह ब्रह्म श्यामसुन्दर ब्रज की पनिहारिनियों द्वारा अपमानित होने पर भी चुरा-चुराकर दही खाता है चारों वेद जिस ब्रह्म का यशोगान करते हैं एवं अगणित गुणों को गा-गाकर सुनाया करते हैं और जिसे अपना यशोगान सुनकर भी सुख नहीं मिलता, उसी को ब्रजांगनाओं की गालियों में इतना सुख मिलता है कि लोट पोट हो जाता है। योगी परमात्मा का ध्यान करता है, ज्ञानी ब्रह्म के ध्यान में निमग्न रहता है किन्तु वह ब्रह्म इन दोनों से एक शब्द भी नहीं बोलता, जबकि उन ब्रजांगनाओं के बछड़ों से तोतली भाषा में बात करता है। शुक-सनकादिक परमहंस जिसका ध्यान करते हैं एवं ध्यान द्वारा समाधि में बुलाते हैं किन्तु वहाँ जाने में मानो उसे लज्जा लगती है। 'कृपालु' कहते हैं वही ब्रह्म श्यामसुन्दर बिना बुलाये अपने आप जाकर किशोरी जी के चरण दबाता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 887-888