लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 180

सखी! पिय, अतिशय सरल सुभाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! piya, atishaya sarala subhāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी! पिय, अतिशय सरल सुभाय।

2अति कोमल-चित कंत, संत कह, तू कठोर कह हाय!।

3पिय निर्दोष रोष जनि करु सखि! बात और ही आय।

4ना जाने वा कुब्जा ने का, जादू-मंत्र चलाय।

5मेरी मानि चलहु सब मथुरा, कुब्जहिं भेष बनाय।

6तब “कृपालु” हरि उर लगाय अरु, कुब्जा रह खिसियाय॥

हिन्दी भावार्थ

(एक सखि द्वारा श्यामसुन्दर को कठोर कहने पर दूसरी सखि विरोध करती हुई कहती है-) अरी सखि! प्रियतम का स्वभाव तो अत्यन्त सरल है। महात्मा नोग भी कहते हैं कि श्यामसुन्दर का हृदय अत्यन्त कोमल है फिर तू कठोर क्यों कहती है? सखि! श्यामसुन्दर निर्दोष हैं। उन पर क्रोध न कर, इसमें कुछ और ही रहस्य है! मेरी राय में तो उस कुब्जा ने ही मोहिनी-मंत्र पढ़ा दिया है, अतएव मेरी बात मान कर सब लोग कुब्जा का वेश बनाकर मथुरा को प्रयाण कर दो। 'कृपालु' कहते हैं कि आजकल प्रियतम को कुबरी स्त्री बहुत प्रिय है, अतएव वे सबको हृदय से नगा लेंगे और वास्तविक कुब्जा खिसियानी सी देखती रह जायेगी।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 852