विरह-माधुरी · पद 181
सखी! मैं, भई अंध अनुहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! maiṁ, bhaī andha anuhāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! मैं, भई अंध अनुहार।
2ज्यों अँधरेहिं नेकहुँ नहिं दीखत, सिगरो जग अँधियार।
3त्यों मो कहँ सिगरो जग भासत, कारोइ नंदकुमार।
4कासों केहि विधि कहा कहौं अब, को उर जाननिहार।
5मो कहँ सब कह"बावरि आई", बावरो सब संसार।
6रहत “कृपालु” प्रीति नहिं छानी, कीजै यतन हजार॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! मैं तो अन्धो के सदृश हो गयी हूँ। जिस प्रकार अन्धे को सारा संसार अन्धकारमय ही दिखाई पड़ता है, कालिमा के सिवा और कुछ नहीं दिखाई पड़ता, उसी प्रकार मुझे भी सारा संसार श्यामसुन्दरमय ही काला-काला दिखाई पड़ता है। अरी सखी! मैं किससे, किस प्रकार एवं क्या कहूँ? मेरे हृदय की अन्तरंग बात को जान ही कौन सकता है? सारा संसार वास्तव में तो स्वयं पागल है, किन्तु वह मुझे कहता है कि देखो-देखो पगली आ गयी। 'कृपालु' कहते हैं कि संसार ठीक ही कहता है। करोड़ों उपायों के करने पर भी जब प्रेमिका का प्रेम छुप नहीं पाता तो उसकी अवस्था पागलों को सी ही हो जाने के कारण संसार का ऐसा कहना उचित ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 852-853