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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 182

सखी! मैं, सुनी कालि इक बात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! maiṁ, sunī kāli ika bāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी! मैं, सुनी कालि इक बात।

2सखिन जूह जुरि-जुरि कालिन्दी, पुलिन रहीं बतरात।

3एक सखी कह"प्रान तजहु अब, मिलहिं न पिय किय घात"।

4अपर सखी कह"जब पिय सुनिहैं, तजि दैहैं निज गात"।

5एक सखी पुनि यौं उठि बोली,"प्रान रहे केहि भाँत"।

6अपर सखी कह"कोटि कल्प लौं, परखहु पद-जलजात"।

7कह “कृपालु” ग्रीषम ऋतु बीते, आवति पुनि बरसात॥

हिन्दी भावार्थ

(सखियों के परस्पर किये हुए वार्तालाप को सुनकर एक सखी दूसरी सखी से कहती है।) अरी सखी! मैंने कल एक बात सुनी है। कल यमुना किनारे सखियों का समुदाय इकट्ठा होकर परस्पर बातें कर रहा था। सर्वप्रथम एक सखी ने समस्त सखियों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि अरी सखियों! अब हम सबको प्राण छोड़ देना ही उचित है, क्योंकि श्यामसुन्दर ने विश्वासघात किया है, अब वे नहीं आयेंगे। दूसरी सखी ने पहली सखी की बात काटते हुए कहा कि यह उचित नहीं है, क्योंकि जब हमारी मृत्यु का समाचार प्रियतम पावेंगे तब वे भी अत्यन्त दुःखी होकर अपना प्राण छोड़ देंगे, अतएव अपने सुख के लिए प्रियतम को दुःखी करना यह प्रेम लक्ष्य नहीं है। इस पर तीसरी सखी ने कहा कि यह तो मैं भी जानती हूँ, पर यह बताओ कि किस प्रकार प्राण धारण करूँ? इस पर चौथी सखी ने कहा कि करोड़ों कल्प तक प्रियतम के दर्शनों की प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना चाहिए, क्योंकि निराशा प्रेम का स्वरूप नहीं है। प्राण तो कोई विरहिणी तब छोड़ना चाहेगी जब उसे प्रियतम के मिलन की आशा ही न रह जाय। 'कृपालु'समस्त सखियों से कहते हैं कि ऐ री सखियों! चिन्ता मत करो ग्रीष्मऋतु-रूपी वियोग के बाद वर्षाऋतु-रूपी मधुर-मिलन का शुभागमन होगा ही।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 853-854