# सखी! मैं, सुनी कालि इक बात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0933-M19-K182
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 182
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 432–433

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सखी! मैं, सुनी कालि इक बात।  
<a id="line-2"></a>सखिन जूह जुरि-जुरि कालिन्दी, पुलिन रहीं बतरात।  
<a id="line-3"></a>एक सखी कह"प्रान तजहु अब, मिलहिं न पिय किय घात"।  
<a id="line-4"></a>अपर सखी कह"जब पिय सुनिहैं, तजि दैहैं निज गात"।  
<a id="line-5"></a>एक सखी पुनि यौं उठि बोली,"प्रान रहे केहि भाँत"।  
<a id="line-6"></a>अपर सखी कह"कोटि कल्प लौं, परखहु पद-जलजात"।  
<a id="line-7"></a>कह “कृपालु” ग्रीषम ऋतु बीते, आवति पुनि बरसात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(सखियों के परस्पर किये हुए वार्तालाप को सुनकर एक सखी दूसरी सखी से कहती है।) अरी सखी! मैंने कल एक बात सुनी है। कल यमुना किनारे सखियों का समुदाय इकट्ठा होकर परस्पर बातें कर रहा था। सर्वप्रथम एक सखी ने समस्त सखियों के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि अरी सखियों! अब हम सबको प्राण छोड़ देना ही उचित है, क्योंकि श्यामसुन्दर ने विश्वासघात किया है, अब वे नहीं आयेंगे। दूसरी सखी ने पहली सखी की बात काटते हुए कहा कि यह उचित नहीं है, क्योंकि जब हमारी मृत्यु का समाचार प्रियतम पावेंगे तब वे भी अत्यन्त दुःखी होकर अपना प्राण छोड़ देंगे, अतएव अपने सुख के लिए प्रियतम को दुःखी करना यह प्रेम लक्ष्य नहीं है। इस पर तीसरी सखी ने कहा कि यह तो मैं भी जानती हूँ, पर यह बताओ कि किस प्रकार प्राण धारण करूँ? इस पर चौथी सखी ने कहा कि करोड़ों कल्प तक प्रियतम के दर्शनों की प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना चाहिए, क्योंकि निराशा प्रेम का स्वरूप नहीं है। प्राण तो कोई विरहिणी तब छोड़ना चाहेगी जब उसे प्रियतम के मिलन की आशा ही न रह जाय। 'कृपालु'समस्त सखियों से कहते हैं कि ऐ री सखियों! चिन्ता मत करो ग्रीष्मऋतु-रूपी वियोग के बाद वर्षाऋतु-रूपी मधुर-मिलन का शुभागमन होगा ही।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 853-854

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
