विरह-माधुरी · पद 179
सखी! तोय, काउ की दीठि लगी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! toya, kāu kī dīṭhi lagī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! तोय, काउ की दीठि लगी।
2अरुणारे अति नैन तिहारे, जनु कहुँ रैन जगी।
3लोक वेद कुल कानि न मानति, नैनन लाज भगी।
4कबहुँक रीझति खीझति कबहुँक, जनु कोउ ठगन ठगी।
5कबहुँक अट्टहास करि आपुहिं, प्रेमसिंधु उमगी।
6हौं “कृपालु” अब जानि गई तू, मोहन-प्रेम पगी॥
हिन्दी भावार्थ
(एक सखी का प्रियतम से मधुर मिलन एवं दूसरी सखी के द्वारा रहस्योद्घाटन।) अरी सखि! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि तुझे किसी को नज़र लग गयी है। संकेत यह है कि तेरी आँखें किसी को आँखों से मिल गयी हैं। अरी सखी! तेरी आँखें अत्यन्त ही मद से युक्त लाल-लाल दिखाई पड़ रही हैं, जैसे तू कहीं सारी रात जागी हुई हो। तू लोक, वेद और वंश की मर्यादाओं को भी छोड़ बैठी है एवं तेरी आँखों में अब लज्जा का भी निवास नहीं है। अरी सखी! तू कभी अकारण ही प्रसन्न दिखाई देती है एवं कभी अप्रसन्न दिखाई पड़ती है, जैसे कि तुझे किसी छलिया ने अपने प्रेम से छल लिया हो। कभी-कभी तो तू प्रेम-सिन्धु में डूबती-उतराती हुई अत्यन्त ही उन्मत्त की भाँति अपने आप ही खिलखिंलाकर हँसने भी लगती है। 'कृपालु' कहते हैं कि इन सब लक्षणों को देखकर मैं अब भली-भाँति समझ गई कि तू प्यारे श्यामसुन्दर के प्रेम में दीवानी हो गई है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 851