विरह-माधुरी · पद 178
सखी! तोय, योग, वियोग कि दोय?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! toya, yoga, viyoga ki doya?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! तोय, योग, वियोग कि दोय?।
2खान-पान कछु नेकु न भावत, सिगरी रैन न सोय।
3सजन सनेही सकल जगत के, अरि सम दीखत तोय।
4नासा-अग्र-भाग अवलोकत, सुधि बुधि दीनी खोय।
5मौन धारि बैठी जनु जग महँ, जड़ चेतन नहिं कोय।
6योगिनि और वियोगिनि दोउन, के ये लच्छन होय।
7तू “कृपालु” सखि! इनमें को है? साँचु बता दे मोय॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी एक विरहिणी से पूछती है कि तू अष्टांग-योग करने वाली योगिनी है अथवा श्रीकृष्ण प्रेम की वियोगिनी है, या दोनों ही है। क्योंकि वे लक्षण तुझमें दिखाई पड़ रहे हैं जो योगिनी एवं वियोगिनी दोनों में ही होते हैं। तूने खाना-पीना बिल्कुल छोड़ दिया है। सारी रात जागती ही रहती है, संसार के सम्बन्धी एवं कुटुम्बी सब तुझे दुश्मन के समान दिखाई पड़ते हैं। तू नासिका के अग्र-भाग में देखती रहती है एवं अपनी देह की सुधि-बुधि ही खो बैठी है। किसी से भी न बोलती हुई मौन धारण करके पत्थर की मूर्ति की तरह बैठी रहती है, मानो तेरे लिए संसार ही नहीं है। उपर्युक्त बातें योगी लोगों में भी होती हैं एवं श्रीकृष्ण वियोगियों में भी होती हैं। अतएव 'कृपालु' पूछते हैं कि अरी सखी! तू मुझे सच-सच बता दे कि तू योगिनी अथवा वियोगिनी, इन दोनों में से कौन है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 850