विरह-माधुरी · पद 177
सखी! कोउ, देउ वैद बुलवाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! kou, deu baida bulavāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! कोउ, देउ वैद बुलवाय।
2हिय बिच शोथ होत जनु हमरे, रहि रहि हाय! पिराय।
3हिरदय गति नित बढ़त जात कोउ, हिय जनु सुई चुभाय।
4सिगरो तन मम तपत विषम ज्वर, रैन नींद नहिं आय।
5छिन-छिन बाढ़त सब रुज लखि सखि!, दृग पावस ऋतु लाय।
6एक व्याधि-बस नर मर आली! हमरे अमित बलाय।
7कत “कृपालु” अकुलाति अबहिं का, आगे परी लखाय॥
हिन्दी भावार्थ
(एक भोली-भाली विरहिणी श्यामसुन्दर के प्रेम में दीवानी, प्रेम को रोग समझकर अपनी सखी से कहती है।) अरी सखी! मुझे कई शारीरिक कष्ट हैं अतएव कोई जाकर वैद्य को बुला दे। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे हृदय के अन्दर कोई फोड़ा हो रहा है, क्योंकि वह बार-बार पीड़ा करता है, तथा मेरे हृदय को गति भी नित्यप्रति बढ़ती ही जा रही है। हृदय में जैसे कोई सुई-सी चुभो रहा है। मेरा सारा शरीर विषम ज्वर (मलेरिया) से तप रहा है तथा रात में नींद भी नहीं आती, आँखों से पानी निकलता रहता है एवं प्रतिक्षण बढ़ता ही जा रहा है। अरी सखी! एक रोग से ही मनुष्य मर जाता है, मुझे तो अनेक रोग हैं। 'कृपालु'व्यंग्य भरे शब्दों में कहते हैं अरी प्रेम रुग्ण सखी! ये ऐसे रोग हैं अभी क्या हुआ। है। आगे-आगे मालूम पड़ेगा। इसके लिए श्यामसुन्दर ही जब वैद्य बनकर आवें तभी ये रोग जा सकते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 849