विरह-माधुरी · पद 176
सखी कोउ, कोउ उपाय बतराय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! kou, kou upāya batarāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी कोउ, कोउ उपाय बतराय।
2जाते सुरति श्यामसुंदर की, भूलेहुँ कबहुँ न आय।
3जब ते गये भूलि गये तब ते, इक पातिहुँ न पठाय।
4अब पिय बिनु अस हूक उठति हिय, मनहुँ प्राण अब जाय।
5जितनोइ चह बिसराय आय सखि! तितनोइ सुधि पिय, हाय।
6याय “कृपालु” उपाय न कछु सखि!, यह निरुपाय बलाय॥
हिन्दी भावार्थ
प्रियतम के वियोग में एक प्रेयसी कहती है-'अरी सखि! कोई मुझे ऐसा उपाय बता दो जिससे श्यामसुन्दर की भूल कर भी याद न आये। वे ऐसे निष्ठुर हो गये कि जब से गये हैं एक चिट्ठी तक नहीं भेजी। उठती है मानो प्राण निकलने ही वाले हैं। मैं थक गयी। हाय! जितना ही उन्हें भुलाना चाहती हूँ. उतने ही वे अधिक याद आते हैं""कृपालु' कहते हैं-'अरी सखि! श्यामसुन्दर के भुलाने का कोई भी उपाय नहीं हो सकता। तत्सम्बन्धी प्रयत्न व्यर्थ है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 848