विरह-माधुरी · पद 175
सखी! इन नैनन कहा करूँ?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ina nainana kahā karūṁ?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! इन नैनन कहा करूँ?।
2इन नैनन की लरिकैयन के, कारण आह भरूँ।
3इन निगुरिन उर आग लगाई, हौं दिन रैन जरूँ।
4इन ने तो निज नात जोरि लइ, हौं भल भार परूँ।
5कछु तो मोहिं समुझाउ श्याम बिनु, केहि विधि धीर धरूँ।
6अब “कृपालु” अस दशा भई मम, ना जीऊँ न मरूँ॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि अरी सखि! मैं इन आँखों का क्या करूँ। इनके लड़कपन के कारण रात-दिन मैं आहें भरा करती हूँ। इन निगुरियों ने हमारे हृदय में आग लगा दी। मैं बिना अपराध के ही जल रही हूँ। इन्होंने तो अपना नाता। श्यामसुन्दर से स्थापित कर लिया, मैं भले ही भाड़ में पड़। अरी सखी! मुझे कुछ तो समझा, मैं किस प्रकार धीरज धारण करूँ। कृपालु' के शब्दों में मेरी दशा तो ऐसी हो गयी है कि न जीवित रहते बनता है और न मरते ही बनता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 848