विरह-माधुरी · पद 174
सखी! इन कानन का न करी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ina kānana kā na karī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! इन कानन का न करी।
2प्रथम मुरलिधर मुरलि तान ते, कानन कान भरी।
3पुनि कानन ने कान भरे इन, नैनन घरी घरी।
4तब इन नैनन हरि नैनन ते, इक दिन जाय लरी।
5गयो हार अब इन नैनन, उन, नैनन बान परी।
6लगतहिं बान “कृपालु” अवनि गिरि, सुधि भूली सिगरी॥
हिन्दी भावार्थ
इस स्रोत में इस पद का हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं है।