विरह-माधुरी · पद 173
सखी इन, अँखियन को समुझाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ina, aṁkhiyana ko samujhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी इन, अँखियन को समुझाय।
2जब ते टुक झाँकी वा झाँकी, बाँकी छवि बलभाय।
3तब ते वारी अति मतवारी, वारी-वारी जाय।
4झुकि झुकि परत, झरत दृग झर-झर, सुरति बिसूरत हाय।
5मतवारी अँखियन लखि सखियन, पूछति"का? री पाय"।
6कह “कृपालु” पायेहु पारस पै, तन-मन-प्रान गमाय॥
हिन्दी भावार्थ
इस स्रोत में इस पद का हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं है।