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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 172

सखी! इन, अँखियन कछु न लखाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ina, aṁkhiyana kachhu na lakhāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखी! इन, अँखियन कछु न लखाय।

2जित देखूँ तित साँवरि सूरति, दीखति अति मन-भाय।

3कबहुँ मिलन-सुख, कबहुँ विरह-दुख, अँखियन नीर बहाय।

4जल बरसावत हारि गई पै, नेकु न तपन बुझाय।

5भुक्ति मुक्ति बैकुण्ठ आदि सखि!, सपनेहुँ नाहिं सुहाय।

6कह “कृपालु” लहि पारस-मणि सखि, कत गुंजन भटकाय॥

हिन्दी भावार्थ

इस स्रोत में इस पद का हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं है।