लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 171

सखि, पुनि वरषा ऋतु आ गई।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhi, puni varashā ṛitu ā gaī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखि, पुनि वरषा ऋतु आ गई।

2गइ ग्रीषम नहिं लइ सुधि प्रीतम, उन मन मथुरा भा गई।

3गगन सघन घन घननन गर्जनि, मोहिं विरहिनि डरपा गई।

4पल-पल चपल चंचला चमकनि, पुनि-पुनि मोहिं तड़पा गई।

5कूकनि पिकनि, मयूरनि कुहुकनि, लोन जरे भुरका गई।

6कह “कृपालु” विरहिनि ऋतु बरषा, दृग-अँसुवन बरसा गई॥

हिन्दी भावार्थ

इस स्रोत में इस पद का हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं है।