विरह-माधुरी · पद 170
सखिन तनु, बिनु प्रियतम पियरान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhina tanu, binu priyatama piyarāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखिन तनु, बिनु प्रियतम पियरान।
2"हा मम प्राणनाथ"! कहि टेरति, हेरति कुंज-लतान।
3कित गये हाय! प्राण-जीवनधन, तजि सब ब्रज-बनितान।
4खाति न पियति न सोवति रोवति, छिन-छिन भरि अँसुवान।
5मुरछित गिरत छिनहिं-छिन कहि"हा!, प्रानन प्यारे कान्ह"।
6कह “कृपालु” रह नित हरि उर महँ, तदपि नैन नहिं मान॥
हिन्दी भावार्थ
इस स्रोत में इस पद का हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं है।