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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 169

सखन इक, पाती लिखी बनाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhana ika, pātī likhī banāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखन इक, पाती लिखी बनाय।

2प्राण-सखे! यह कौन रीति तव? पातिहुँ नाहिं पठाय।

3केहि अपराध कन्हैया! हम कहँ, दिये हाय! बिसराय।

4तुम तो सखा-सनातन हम कहँ, कहत रहे उर लाय।

5बिनु तुम असन वसन भूषन अरु, गोचारन न सुहाय।

6मन कह पकरि कान लै आवूँ, बुधि कह मथुरा राय।

7कह “कृपालु” हौं चह नहिं पाती, जात प्रान अब आय॥

हिन्दी भावार्थ

(मथुरा-गमन के पश्चात् ग्वाल-बालों का श्यामसुन्दर को पत्र लिखना)। समस्त गवालबालों ने मिलकर श्यामसुन्दर को एक पत्र लिखा ''हे प्राण-प्रिय सखे! यह तुम्हारी कौन सी रीति है कि एक पत्र तक नहीं भेजा? हाय कन्हैया! हम लोगों से ऐसा क्या अपराध हो गया है जिससे तुमने हमें भुला दिया? तुम तो हमें नित्य-सखा कहा करते थे, फिर इसी जन्म में साथ क्यों छोड़ रहे हो? तुम्हारे बिना खाना, कपड़ा, शृंगार एवं गोचारण कुछ नहीं भाता। मन तो कहता है पूर्वाधिकारानुसार तुम्हें कान पकड़ कर ले आवें किन्तु बुद्धि कहती है, ''अरे! अब वे मथुरा के राजा हो गये हैं।''"कृपालु' कहते हैं कि हम पत्र के उत्तर में पत्र नहीं चाहते, हमारे प्राण जा रहे हैं, तुम्हारा दर्शन चाहते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 847-848