विरह-माधुरी · पद 168
श्रीराधे! तोरे कौन बलाय लगी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhe! tore kauna balāya lagī?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्रीराधे! तोरे कौन बलाय लगी।
2चिबुक पानि धरि रहति बिसूरति, जनु पिय-प्रेम पगी।
3सतराने, अलसाने नैना, जनु कहुँ रैन जगी।
4छिन आँगन छिन बाहर भाजति, छिन जनु रहति ठगी।
5प्रकटत सात्विक-भाव प्रेम-नदि, जनु अंबुधि उमगी।
6कत “कृपालु” यह भेद दुरावति, हौं तो तोरि सगी॥
हिन्दी भावार्थ
( प्रियतम श्यामसुन्दर के प्रेम में विभोर वृषभानुनन्दिनी श्रीराधिका जी से उनको एक परम अन्तरंग सखी पूछती है।) हे किशोरी जी! तुम्हें कौन सा रोग लग गया है? तुम अपनी ठोढ़ी पर हाथ रखकर न जाने क्या चिंतन किया करती हो मानो प्रियतम के प्रेम में उन्मत्त हो। तुम्हारी आँखें अत्यन्त ही मदभरी एवं संकोच से युक्त हैं, मानो रात भर जागरण किया हो। तुम क्षण-क्षण में कभी आँगन में, कभी बाहर पागल-सी घूमती फिरती हो, पुनः उदासीन सी होकर बैठ जाती हो। तुम्हारे शरीर में आठों सात्विक भाव बार-बार प्रकट होते हैं मानो प्रेम-रूपी नदी प्रेमास्पद-रूपी समुद्र की ओर अत्यन्त ही वेग से जा रही हो। 'कृपालु' कहते हैं कि हे किशोरी जी! यह र प्रेम का रहस्य मुझसे क्यों छिपा रही हो?? मैं तो तुम्हारी अन्तरंग सखी हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 846-847