विरह-माधुरी · पद 167
श्याम! हौं योगिनि भेष बनैहौं।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma! hauṁ yogini bhesha banaihauṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्याम! हौं योगिनि भेष बनैहौं।
2लोक, वेद, कुल-कानि-आनि तजि, त्रिकुटी ध्यान लगैहौं।
3जटाजूट निज शीश बँधैहौं, अंग विभूति लगैहौं।
4कंथा पहिरि पाणि लै खप्पर, अनशन देह सुखैहौं।
5धरि अवधूत स्वाँग जनु शंकर, घर घर अलख जगैहौं।
6जो “कृपालु” पिय तबहुँ न पैहौं, विरहागिनि जरि जैहौं॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि हे श्यामसुन्दर! अब मैं तुम्हारे मधुर-मिलन के लिए योगिनी का वेश बनाऊँगी। लोक वेद, एवं बंश की समस्त आन-बान को छोड़कर त्रिकुटी के मध्य में ध्यान लगाऊँगी। अपने सिर पर जटा-जूट बँधाऊँगी एवं सारे शरीर में भस्म लगाउँगी। गुदड़ी ओढ्कर एवं हाथ में कमंडल लेकर बिना अन्न-जल के उपवास द्वारा अपने शरीर को सुखा दूँगी। मैं अवधूतों की तरह स्वग बनाकर शंकर जी के समान घर-घर में 'अलख''अलख'का नारा लगाऊँगी। कृपालु' कहते हैं कि इतना करने पर भी यदि प्रियतम को दया न आयेगी एवं वे दर्शन न देंगे, तब मैं विरह को अग्नि में जलकर भस्म हो जाऊँगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 845-846