विरह-माधुरी · पद 166
श्याम बिनु, भई श्याम हौं वीर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma binu, bhaī shyāma hauṁ vīra!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्याम बिनु, भई श्याम हौं वीर।
2तनु झुलसत परि विरह-दवानल, धरत न उर अब धीर।
3इत हौं विरहिनि जरी जात उत, दृग बरसावत नीर।
4याते जरत न बुझत, रहत नित, सुलगत गौर शरीर।
5रसिक-शिरोमणि बिनु सखि! को यह, जानि सके उर पीर।
6तनुहिं “कृपालु” श्याम नहिं मनहूँ, श्याम देखु उर चीर॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि अरी सखि! मैं तो श्यामसुन्दर के बिना श्याम रंग की हो गयी, अर्थात् काली पड़ गयी। विरह की प्रदीप्त अग्नि में प्रतिक्षण जलती रहती हूँ हृदय में किसी प्रकार से भी धैर्य नहीं आता। एक ओर तो विरहाग्नि मुझे जलाती है एवं दूसरी. ओर आँखों से मैं आँसू बरसाती हूँ। इसलिये मेरा यह गौर रंग का शरीर न तो जलता ही है और न बुझता ही है, निरन्तर सुलगता ही रहता है। अरी सखि! रसिक शिरोमणि प्यारे श्यामसुन्दर के बिना मेरी हार्दिक वेदना को दूसरा कौन समझ सकता है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! तेरी देह ही श्याम नहीं है वरन् तेरा मन भी श्याम है। यदि तुझे विश्वास न हो तो हृदय फाड़कर देख ले, उसमें काले श्यामसुन्दर बैठे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 844-845