विरह-माधुरी · पद 165
श्याम कत, एतिक भये कठोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma kata, etika bhaye kaṭhora?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्याम कत, एतिक भये कठोर।
2रहीं सदा वृषभानुदुलारी, प्रानन-प्यारी तोर।
3उन दर्शन बिन लगत रह्यो तोहिं, इक पल कलप करोर।
4कहत रहे उन चरन-धूरि कहँ, प्राण-सजीवनि मोर।
5रहे मनावत मानिनि लखि उन, सजल नैन कर जोर।
6अब “कृपालु” ह्वै गयो कहा तोय, प्रियतम नंद किशोर॥
हिन्दी भावार्थ
(श्यामसुन्दर के वियोग में विरहिणी गोपांगनाओं को दयनीय दशा-) हे श्यामसुन्दर! तुम इतने निष्ठुर कैसे हो गये? तुमको तो किशोरी जी प्राणों से भी प्यारी लगती थीं। उनके बिना तुम्हें एक क्षण भी करोड़ों कल्प के समान प्रतीत होता था। उनकी चरणधूलि को प्राण संजीवनी कहा करते थे। उनके मना करने पर हाथ जोड़कर आँसू बहाते हुए मनाया करते थे। हे प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर! 'कृपालु' के शब्दों में, अब तुम्हें क्या हो गया है? क्या तुम्हें वह सब भूल गया है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 844