विरह-माधुरी · पद 164
श्याम! अब बेगि बचावो जी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma! aba begi bachāo jī!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्याम! अब बेगि बचावो जी।
2विरह-दुशासन प्रान हरन चह, वसन बढ़ाओ जी।
3विरह-ज्वाल सों जरी जात हौं, धाइ बुझावो जी।
4कहा करूँ कित जाउँ हाय! मैं, तुमहिं बताओ जी।
5अब तो प्राण चलन चह प्रियतम, धीर बँधाओ जी।
6जो “कृपालु” पिय किय अबेर तो, जियत न पावो जी॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि हे प्राणाधार श्यामसुन्दर! विरह-रूपी दुःशासन मेरा प्राण-रूपी वस्त्र खींच रहा है अब आकर शीघ्र ही मेरी रक्षा करो। मैं विरह की आग में जली जा रही हूँ, दौड़कर तुरन्त आग बुझा दो। हे प्रियतम! तुम्हीं बताओ कि तुम्हारे बिना मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ? अब तो मेरे प्राण निकलना ही चाहते हैं, किसी भी प्रकार धीरज बाँधा दो। 'कृपालु' कहते हैं कि हे प्राणेश्वर! अब यदि देर करोगे तो मुझे जीवित न पा सकोगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 843