विरह-माधुरी · पद 163
विरह दुख, कहि न जाय सहि जाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: viraha dukha, kahi na jāya sahi jāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1विरह दुख, कहि न जाय सहि जाय।
2जाको भयो वियोग रोग नहिं, सो किमि समुझि सकाय।
3जेहि कहु बात बनाय सोइ, इमि, उलटी होय हँसाय।
4बिनुहि बताये रहि न जाय पुनि, छिन-छिन विरह सताय।
5रोम-रोम रमि रह्यो श्याम इमि, जिमि तिल तैल समाय।
6पुनि “कृपालु” जो चह भुलाय तो, अधिक अधिक सुधि आय॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! दुःख कहते नहीं बनता, बस सहते ही बनता है। किसी को यह रोग नहीं होता, तब तक वह इस रहस्य को नहीं समझ सकता। अगर किसी से कहा भी जाय तो वह उल्टे बातें बनाता है और इस प्रकार उसकी और भी हँसी होती है। विरह दुःख के आधिक्य के कारण किसी से बिना बताये भी रहा नहीं जाता। अरी सखि! इस प्रकार समा जाता है जिस प्रकार तिल में तेल समाया रहता है। "कृपालु कहते हैं कि अरी सखि फिर एक समस्या और भी है कि उसको जितना भुलाना चाहती हूँ, वह उतना ही अधिक याद आता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 842-843