# विरह दुख, कहि न जाय सहि जाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0914-M19-K163
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 163
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 425–425

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>विरह दुख, कहि न जाय सहि जाय।  
<a id="line-2"></a>जाको भयो वियोग रोग नहिं, सो किमि समुझि सकाय।  
<a id="line-3"></a>जेहि कहु बात बनाय सोइ, इमि, उलटी होय हँसाय।  
<a id="line-4"></a>बिनुहि बताये रहि न जाय पुनि, छिन-छिन विरह सताय।  
<a id="line-5"></a>रोम-रोम रमि रह्यो श्याम इमि, जिमि तिल तैल समाय।  
<a id="line-6"></a>पुनि “कृपालु” जो चह भुलाय तो, अधिक अधिक सुधि आय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! दुःख कहते नहीं बनता, बस सहते ही बनता है। किसी को यह रोग नहीं होता, तब तक वह इस रहस्य को नहीं समझ सकता। अगर किसी से कहा भी जाय तो वह उल्टे बातें बनाता है और इस प्रकार उसकी और भी हँसी होती है। विरह दुःख के आधिक्य के कारण किसी से बिना बताये भी रहा नहीं जाता। अरी सखि! इस प्रकार समा जाता है जिस प्रकार तिल में तेल समाया रहता है। "कृपालु कहते हैं कि अरी सखि फिर एक समस्या और भी है कि उसको जितना भुलाना चाहती हूँ, वह उतना ही अधिक याद आता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 842-843

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
