विरह-माधुरी · पद 162
वियोगिनि, अँसुवन हार पिरोय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: viyogini, aṁsuvana hāra piroya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1वियोगिनि, अँसुवन हार पिरोय।
2करि करि सुरति श्यामसुंदर की, विरहिनि छिन-छिन रोय।
3गहवर-वन, वृंदावन, निधिवन, निरखि दुसह दुख होय।
4सेवा-कुंज सरस रति-रस की, सुरति बिसूरति सोय।
5घर-आँगन प्रिय-परिजन भूषन, वसन न भावत कोय।
6धनि “कृपालु” तिय तदपि कहति पिय, करिय भाय जो तोय॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी दोनों आँखों से लेकर वक्षःस्थल के बीच तक निरन्तर आँसुओं की माला गूँथ रही है। को याद करके क्षण-क्षण में बार-बार रोती है। वृन्दावन एवं निधिवन को देखकर असह्य दुःख होता है। कुंज के रास-रस की बार-बार याद आती है। एवं बाहर तथा प्रिय-परिजन एवं आभूषण सस्त्रादि कुछ भी नहीं अच्छा लगता। 'कृपालु' कहते हैं उस विरहिणी को धन्य है जो इतनी असह्य वेदना के पीने पर भी प्रियतम से रुष्ट नहीं होती वरन् यह कहती है ''प्रियतम जिस प्रकार सुखी रहें वही करें!।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 841-842