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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 161

लाल को, जाल भली मैं जानी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lāla ko, jāla bhalī maiṁ jānī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1लाल को, जाल भली मैं जानी।

2सुनु सखि! तोहिं बताऊँ उनकी, सिगरी कपट कहानी।

3तजि पितु मातु बंदिगृह छल बस, बन्यो पूत नँदरानी।

4मोर पंख सिर भेद जनावत,"अहि अहार, मधुवानी"।

5गुंजमाल, वनमाल रूप-छल, महँगी कौड़ी कानी।

6तन घन बिच पट पीत न थिर रह, दामिनि गुन उनमानी।

7विपुल छिद्र, छूछो हिय मुरली, जेहि सुनि हम बौरानी।

8किमि “कृपालु” इमि प्रकट बखानत, निगम नेति जेहि मानी॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी झुंझलाकर विनोदमयी कटूक्ति द्वारा कहती है कि अरी सखी! मैं श्यामसुन्दर के जाल को भली भाँति जानती हूँ। अरी सखि! मैं उनकी सारी ही कपट से भरी हुई बातें बताती हूँ, सुन! अवतार लेते ही माता-पिता से कपट करते हुए जेल छोड़कर यशोदा का पुत्र बन गया। अरी सखि! उसके सिर पर मोर पंख यही तो भेद बताता है कि जैसे मैं (मोर) साँपों को खाता हूँ किन्तु अत्यन्त ही मधुर बोलता हूँ ठीक इसी प्रकार श्यामसुन्दर भी हैं। गुञ्जमाला एवं वनमाला भी देखने मात्र के लिए ही हैं, उसका मूल्य एक कौड़ी भी नहीं। उसके शरीर रूपी बादल पर फहराता हुआ पीताम्बर यही तो सिद्ध करता है कि चपला के समान मेरी प्रीति भी चपल है। इसी तरह उसकी मुरली भी, जिसका हृदय छूछा है एवं जिसमें अनेकानेक छिद्र हैं, जिसे सुनकर हम दीवानी हो जाती हैं, श्यामसुन्दर का पूर्ण परिचय देती है। 'कृपालु' कहते हैं कि जिसे वेदों ने 'नेति नेति'कहा है उसे दोष रूप में क्यों प्रकट वर्णन करती है?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 840-841