विरह-माधुरी · पद 160
लाग उर, हाय विरह की आग।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lāga ura, hāya viraha kī āga
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लाग उर, हाय विरह की आग।
2वस्तु जराय बुझत पुनि आपुहिं, जग दावागिनि लाग।
3सुलगत रहत रैन-दिन पै उर, लाग आग अनुराग।
4दिन दृग झर निर्झर जनु झर-झर, रैन बितावति जाग।
5नहिं भावत कछु साज-बाज सखि, लोक-लाज गइ भाग।
6कह “कृपालु” यह विरह आग नहिं, परमहंसहूँ भाग॥
हिन्दी भावार्थ
एक श्याम-वियोगिनी कहती है-हाय सखि! हृदय में श्यामसुन्दर के वियोग की आग लग गयी है। यह कितने आश्चर्य की बात है कि संसार में किसी वस्तु में लगी हुई दावाग्नि उस वस्तु को जलाने के पश्चात् स्वयं बुझ जाती है किन्तु श्यामसुन्दर के वियोग की आग दिन-रात हृदय में सुलगती रहती है। दिन भर आँखों से झरने की तरह पानी झरता रहता है एवं रात जाग-जाग कर बिताती हूँ। संसार सम्बन्धी ऐश्वर्यो को चहल-पहल बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, फिर लोक लज्जा ने भी तो साथ छोड़ दिया है। 'कृपालु' कहते हैं अरी सखि! तू जिस विरह के विरुद्ध बात कर रही है यह तो करोड़ों परमहंसों में भी किसी बड़भागी को ही प्राप्त होता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 840