# लाग उर, हाय विरह की आग।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0911-M19-K160
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 160
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 423–423

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लाग उर, हाय विरह की आग।  
<a id="line-2"></a>वस्तु जराय बुझत पुनि आपुहिं, जग दावागिनि लाग।  
<a id="line-3"></a>सुलगत रहत रैन-दिन पै उर, लाग आग अनुराग।  
<a id="line-4"></a>दिन दृग झर निर्झर जनु झर-झर, रैन बितावति जाग।  
<a id="line-5"></a>नहिं भावत कछु साज-बाज सखि, लोक-लाज गइ भाग।  
<a id="line-6"></a>कह “कृपालु” यह विरह आग नहिं, परमहंसहूँ भाग॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक श्याम-वियोगिनी कहती है-हाय सखि! हृदय में श्यामसुन्दर के वियोग की आग लग गयी है। यह कितने आश्चर्य की बात है कि संसार में किसी वस्तु में लगी हुई दावाग्नि उस वस्तु को जलाने के पश्चात् स्वयं बुझ जाती है किन्तु श्यामसुन्दर के वियोग की आग दिन-रात हृदय में सुलगती रहती है। दिन भर आँखों से झरने की तरह पानी झरता रहता है एवं रात जाग-जाग कर बिताती हूँ। संसार सम्बन्धी ऐश्वर्यो को चहल-पहल बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, फिर लोक लज्जा ने भी तो साथ छोड़ दिया है। 'कृपालु' कहते हैं अरी सखि! तू जिस विरह के विरुद्ध बात कर रही है यह तो करोड़ों परमहंसों में भी किसी बड़भागी को ही प्राप्त होता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 840

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
