विरह-माधुरी · पद 159
लगी री मोहिं, श्याम-दृगन की चोट।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lagī rī mohiṁ, shyāma-dṛigana kī choṭa
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लगी री मोहिं, श्याम-दृगन की चोट।
2पलक न हाय! पलक-दृग लागत, भये पलक ते ओट।
3व्याकुल बिनु अपराध प्रान भये, कीन दृगन ने खोट।
4मिल्यो जाय अब मनहुँ दृगन सों, तोरि कानि-कुल-कोट।
5अब हौं विलपति प्रति कुंजन, उर, धरे विरह की पोट।
6तितनोइ खोट “कृपालु” नंद को, ढोटा, जितनोइ छोट॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि मुझे श्यामसुन्दर की आँखों की चोट ने घायल कर दिया है। अब उनके पलकों से ओट होते ही एक क्षण को भी चैन नहीं पड़ता एवं आँखों की नींद भी चली गयी। यद्यपि लड़कपन या उद्दण्डता मेरी आँखों ने ही की थी, मेरे प्राणों का कोई भी दोष नहीं था। फिर भी और करे अपराध कोउ और पाव फलभोग'के अनुसार अब प्राण भी अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं। मन ने भी प्राणों से विश्वासघात किया एवं वंश परम्परा के मर्यादा-रूपी किले को तोड़कर आँखों से जा मिला। अब मैं हृदय में विरह का बोझ लिए हुए एवं प्रत्येक कुँज में प्यारे श्यामसुन्दर से मिलन के लिए विलाप करती हुई भटक रही हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि हाय! हाय!! यह नन्द ढोटा जितना ही छोटा है उतना ही खोटा भी है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 839