विरह-माधुरी · पद 158
लखो जनि!, कान्ह की मुसकान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakho jani, kānha kī musakāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखो जनि!, कान्ह की मुसकान।
2जो चाहो भूतल पर अपनी, लोक आन अरु बान।
3लखतहिं विधि-मरजाद वेद की, छूटि जाति कुल-कान।
4तर्क-वितर्क, कुतर्क आदि को, रहत न उर अभिमान।
5"हौं बड़, हौं बड़"बड़बड़ात जो, उड़त कपूर समान।
6"हौं अपराधी कुटिल नीच"इमि, कहि ढरिहौ अँसुवान।
7बिगरिय आपु बिगारिय औरहुँ, यह व्यापार न आन।
8हम “कृपालु” जन्मांध भले अति, पंडित चतुर सुजान॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी श्यामसुन्दर के वियोग में खीझकर सांसारिक जीवों को सावधान करती है कि अरे सांसारिक जीवों! यदि तुम संसार में अपनी लौकिक आन-बान रखना चाहते हो तो भूलकर भी श्यामसुन्दर की मुस्कान न देखना क्योंकि देखते ही वेद की कही हुई वर्णाश्रम-व्यवस्था की मर्यादा एवं वंश-मर्यादा सभी-कुछ छूट जायगी। तुम जो स्वाभिमानपूर्वक भगवद्विषयों में तर्क ही नहीं वरन् वितर्क एवं कुतर्क तक करते रहते हो वह सब नष्ट हो जायगा। 'हम सबसे बड़े हैं, हम सबसे बड़े हैं', इस प्रकार जो सदा ही बड़बड़ाते रहते हो, वह सब उनको देखते ही कपूर के समान उड़ जायगा। अरे संसारियों। उस मुस्कान के देखने पर तुम अपने-आपको अपराधी, कुटिल एवं नीच आदि कहते हुए आँखों से निरन्तर आँसू बहाओगे। इतना ही नहीं वरन् अपने-आप बिगड़कर फिर औरों को भी बिगाड़ोगे। बस, यही तुम्हारा निरन्तर का कार्य हो जायगा। 'कृपालु'अपने लिए कहते हैं कि हम तो अपने कुसंस्कारों की कृपा से अच्छा हुआ र जन्म से ही अन्धे हुए (जन्मान्ध के लिए कुछ भी देखना असम्भव है), फिर साथ ही हम परम चतुर, ज्ञानी पंडित भी हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 838-839