# लखो जनि!, कान्ह की मुसकान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0909-M19-K158
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 158
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 422–423

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लखो जनि!, कान्ह की मुसकान।  
<a id="line-2"></a>जो चाहो भूतल पर अपनी, लोक आन अरु बान।  
<a id="line-3"></a>लखतहिं विधि-मरजाद वेद की, छूटि जाति कुल-कान।  
<a id="line-4"></a>तर्क-वितर्क, कुतर्क आदि को, रहत न उर अभिमान।  
<a id="line-5"></a>"हौं बड़, हौं बड़"बड़बड़ात जो, उड़त कपूर समान।  
<a id="line-6"></a>"हौं अपराधी कुटिल नीच"इमि, कहि ढरिहौ अँसुवान।  
<a id="line-7"></a>बिगरिय आपु बिगारिय औरहुँ, यह व्यापार न आन।  
<a id="line-8"></a>हम “कृपालु” जन्मांध भले अति, पंडित चतुर सुजान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी श्यामसुन्दर के वियोग में खीझकर सांसारिक जीवों को सावधान करती है कि अरे सांसारिक जीवों! यदि तुम संसार में अपनी लौकिक आन-बान रखना चाहते हो तो भूलकर भी श्यामसुन्दर की मुस्कान न देखना क्योंकि देखते ही वेद की कही हुई वर्णाश्रम-व्यवस्था की मर्यादा एवं वंश-मर्यादा सभी-कुछ छूट जायगी। तुम जो स्वाभिमानपूर्वक भगवद्विषयों में तर्क ही नहीं वरन् वितर्क एवं कुतर्क तक करते रहते हो वह सब नष्ट हो जायगा। 'हम सबसे बड़े हैं, हम सबसे बड़े हैं', इस प्रकार जो सदा ही बड़बड़ाते रहते हो, वह सब उनको देखते ही कपूर के समान उड़ जायगा। अरे संसारियों। उस मुस्कान के देखने पर तुम अपने-आपको अपराधी, कुटिल एवं नीच आदि कहते हुए आँखों से निरन्तर आँसू बहाओगे। इतना ही नहीं वरन् अपने-आप बिगड़कर फिर औरों को भी बिगाड़ोगे। बस, यही तुम्हारा निरन्तर का कार्य हो जायगा। 'कृपालु'अपने लिए कहते हैं कि हम तो अपने कुसंस्कारों की कृपा से अच्छा हुआ र जन्म से ही अन्धे हुए (जन्मान्ध के लिए कुछ भी देखना असम्भव है), फिर साथ ही हम परम चतुर, ज्ञानी पंडित भी हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 838-839

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
