लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 157

लखी सखि! जब ते सुंदर-श्याम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhī sakhi! jaba te sundara-shyāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1लखी सखि! जब ते सुंदर-श्याम।

2तब ते दृगन सदा सावन जनु, बरसत रह अविराम।

3मन हरि लै गयो, दै गयो हरि उर, विरहागिनि वसुयाम।

4एक बात समुझाय सखी! मोहिं, मन-बुधि-भइ बेकाम।

5उरझाने नैनन पुनि चोरी, मन की कत भइ राम!।

6सखि कह"सुन उरझनि सुरझावन, आयो मन तेहि ठाम।

7को “कृपालु” सुरझावन की कह, बिको आपु बिनु दाम"॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर के वियोग में एक ब्रजदेबी कहती है-सखि।! जब से श्यामसुन्दर को देखा है, तब से आँखों में सावन की झड़ी के समान निरन्तर आँसू बहते रहते हैं। श्यामसुन्दर मन चुरा ले गये एवं विरह की आग लगा गये। अरी सखि! मेरी बुद्धि तो काम नहीं करती, जरा तू ही बता। एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही है वह यह कि युद्ध तो आँखों आँखों में हुआ था, किन्तु हाय राम! मन की चोरी कैसे हो गई? सखि ने उत्तर दिया-''अरी सखि! सुन, आँखों की उलझन को सुलझाने के लिये मन न्यायाधीश बन कर गया था''। 'कृपालु' के शब्दों में सखि कहती है कि आँखों की उलझन को सुलझाने की कौन कहे, मन ही बरबस उलझ गया।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 837