विरह-माधुरी · पद 156
लखी पिय, जा दिन मृदु मुसकाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhī piya, jā dina mṛidu musakāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखी पिय, जा दिन मृदु मुसकाय।
2ता दिन ते सखि रोम-रोम महँ, गइ सोइ सुरति समाय।
3जित देखुँ तित सोइ छवि दीखत, सब कह गइ बौराय।
4विरह-अगिनि छीजत तन छिन-छिन, निशि-दिन दृग बरसाय।
5प्रिय-जन करत विविध-विधि औषधि, कहा काहि समुझाय।
6कह “कृपालु” इक बार हाय! पुनि, कोइ सोइ छवि दिखराय॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है- "जिस दिन से प्रियतम श्यामसुन्दर की मन्द मुस्कान का अवलोकन किया है उस दिन से अरी सखि! श्यामसुन्दर की रूपमाधुरी मेरे रोम-रोम में समा गयी है। जिधर देखती हूँ उधर ही मनोहारिणी छवि दिखायी पड़ती है। सब कहते हैं यह "पागल हो गयी है'। विरहाग्नि में जल-जल कर क्षण-क्षण में शरीर क्षीण होता जा रहा है। जब कि दिन-रात आँसू बरसाया करती हूँ। स्वार्थी प्रियजन शारीरिक व्याधि समझ कर विविध प्रकार के उपचार करते हैं। तू ही बता किसको क्या समझाऊँ? रा शब्दों में सखि कहती है-हाय रे! वही माधुरी-मूर्ति दिखा दे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 836-837