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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 155

रैन-दिन विरहिनि तलफत जात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raina-dina virahini talaphata jāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1रैन-दिन विरहिनि तलफत जात।

2दई!! दई!! दइ!! हाय! हाय! कहि, पुनि पुनि अति अकुलात।

3कुंज-पुंज टेरत हेरत हरि, सुंदर श्यामल गात।

4तारे गिन गिन छिन छिन बितवति, कालनिशा-सम रात।

5ग्रह गृहीत जिमि नाचति, गावति, हँसति रुदति बतरात।

6बैरी विरह “कृपालु” लगायो, प्राण लेन की घात॥

हिन्दी भावार्थ

विरहिणी कहती है कि दिन एवं रात तड़पते हुए ही व्यतीत होती है। मैं बार-बार विरह में व्याकुल होकर "हाय दई! ड दई!! क हकर आहें भरा करती हूँ। प्रत्येक कुंज में अपने प्यारे श्यामसुन्दर को पुकारती हुई ढूँढा करती हूँ। एक एक क्षण तारे गिन-गिनकर कालनिशा के समान रात्रि व्यतीत करती हूँ। भूत लगे हुए के समान नाचती हूँ, कभी गाती हूँ, कभी रोती हूँ, कभी हँसती हूँ एवं कभी अपने आप ही प्रियतम से उनके वियोग में बातें करती हूँ। "कृपालु कहते हैं कि इस विरह रूपी शत्रु ने अब मेरे प्राण लेने की सोच ली है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 835-836