विरह-माधुरी · पद 154
रैन-दिन नैनन नीर ढरे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raina-dina nainana nīra ḍhare
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रैन-दिन नैनन नीर ढरे।
2जब ते लखी मंजु सो झाँकी, कुंज लतान तरे।
3भनत बनै न नैन चितवनि अति, रतिरस रंग भरे।
4ललित त्रिभंग अनंग विमोहन, मृदु मुसकात खरे।
5लखतहिं सखी! हाय किरिकिरि सों, नैनन आन परे।
6अब “कृपालु” कैसेहुँ नहिं निकसत, ऐसे आन अरे॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि अरी सखि! अब तो दिन-रात आँखों से आँसू बहा करते हैं। जब से लता-कुंज में उस मनोहर झाँकी को देखा है। उनकी आँखों की वह चितवनि जिनमें अति प्रेम भरा हुआ था अनिर्वचनीय है। वे तीन स्थान से टेढ़े, कामदेव को मोहित करने वाले श्यामसुन्दर मन्द-मन्द मुस्कराते खड़े थे। अरी सखि! देखते ही वे मेरी आँखों में किरकिरी के समान पड़ गये। 'कृपालु' के शब्दों में वे आँखों में ऐसे अड़ गये कि किसी प्रकार निकाले नहीं निकलते।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 835