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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 153

रैन-दिन, नैनन चैन परै न।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raina-dina, nainana chaina parai na

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1रैन-दिन, नैनन चैन परै न।

2जब ते मार्यो नैन-सैन पिय, पैन किंतु सुखदैन।

3तब ते भूख प्यास नहिं लागति, लागति नींद न रैन।

4मन ही मन पिय गुन-गन गावति, नहिं भावति सखि बैन।

5कबहुँ इतै आनंद कि मैं ना, कबहुँ न इक छिन चैन।

6पियत “कृपालु” प्रेमविष-अमृत, पै टुक प्यास बुझै न॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! श्यामसुन्दर के बिना इन आँखों को एक-क्षण को भी चैन नहीं मिलता। अरी सखि! जब से श्यामसुन्दर ने अनन्त सुख देने वाले पैने कटाक्षों से प्रेम रस-दान किया है, तब से न तो भूख-प्यास ही लगती है और न रात भर नींद आती है। लोक-लज्जा के कारण मन ही मन प्रियतम के सौन्दर्य माधुर्य आदि का गुणगान करती हूँ। सखियों की रसीली बातें भी कड़वी लगती हैं। कभी मिलन-जन्य सुख में सुधि-बुधि खो बैठती हूँ एवं कभी वियोग में सब कुछ भूल जाती हूँ। 'कृपालु' के शब्दों में सखि कहती है कि इस प्रकार विष एवं अमृत युक्त प्रेम रस पीते हुए भी थोड़ी भी प्यास नहीं बुझती, अपितु बढ़ती ही जाती है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 834