विरह-माधुरी · पद 152
रैन-दिन तलफि रहे दोउ नैन।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raina-dina talaphi rahe dou naina
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रैन-दिन तलफि रहे दोउ नैन।
2दृग बरसावति दिवस बितावति, तारे गिन गिन रैन।
3कोटि यतन करि-करि हौं हारी, नेकु न आवत चैन।
4हार सिंगार भार सम लागत, विष सम सखियन-बैन।
5काहू सों कछु कहत बनै नहिं, कहे बिनाहुँ सरै न।
6करत “कृपालु” विचार हारि गये, हाथन चंद दुरै न॥
हिन्दी भावार्थ
विरहिणी कहती है कि मेरी दोनों आँखें प्रियतम श्यामसुन्दर की रूप-माधुरी के लिए निरन्तर तड़पती हैं। सारा दिन आँसू बहाते हुए बीत जाता है एवं सारी रात तारे गिनते हुए बीतती है। मैं करोड़ों प्रयत्न करके हार गई किन्तु किंचित् भी चैन नहीं मिलता। समस्त आभूषण एवं शृंगार की वस्तुएँ प्रियतम के वियोग में भार सी लगती हैं तथा अन्तरंग सखियों की मधुर वाणी भी विष के समान प्रतीत होती है। यह ऐसी बात है कि न तो किसी से कहते ही बनती है और न बिना कहे जी ही हल्का होता है। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तो अपनी से विचार करते-करते थक गया किन्तु इसी निर्णय पर पहुँचा कि जिस प्रकार चन्द्रमा हाथों से नहीं छिपाया जाता उसी प्रकार उमड़ता हुआ प्रेम भी प्रेमिका द्वारा अधिक देर तक छिपाया नहीं जा सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 833-834