विरह-माधुरी · पद 151
रही सखि!, बात तोर या मोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rahī sakhi! bāta tora yā mora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रही सखि!, बात तोर या मोर।
2वा दिन कहति रही अति कोमल, प्रियतम नंदकिशोर।
3मथुरा जाय लुभाय कूबरिहिं, सुधि बिसरायेउ तोर।
4अब कहु प्रियतम अति कोमल या, कर्कश कुलिश करोर।
5सखि कह"होत न जो पिय कोमल, नेकहुँ होत कठोर।
6तो सोचहु जिय कत कुबरिहुँ तिय, लेति पिया चित चोर।
7सखि “कृपालु” कह हारि गई हौं, बात तोर बरजोर॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर के वियोग में एक सखि दूसरी सखि से कहती है- 'अरी सखि! बता तेरी बात रही या मेरी बात रही। उस दिन तू कह रही थी कि श्यामसुन्दर अत्यन्त कोमल हैं। किन्तु देख लिया? मथुरा जाकर कुब्जा में इतने आसक्त हो र हैं कि तुमको बिल्कुल भुला दिया। अत्यन्त कोमल हैं या करोड़ों वज्र के समान कठोर हैं? ने उत्तर दिया-''अरी सखि! होते, किंचित भी कठोर होते, तो तू ही सोच कि भला एक कुबरी स्त्री, अनन्त कोटि कन्दर्प लावण्य को किस प्रकार वश में कर लेती?''"कृपालु' कहते हैं कि सखि ने अपनी हार मान ली और कहा-तेरी बात ही रही अर्थात् श्यामसुन्दर सचमुच अत्यन्त कोमल हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 832-833