विरह-माधुरी · पद 150
रहत इन, नैनन नित बरसात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rahata ina, nainana nita barasāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रहत इन, नैनन नित बरसात।
2दै गये पिय विरहानल जब ते, यह बरसात न जात।
3सब पूछत तुम्हरे सुत-वित-पति, कत रोवति दिन-रात।
4तुमहि कहौ हौं कहौं कहा सखि! जार-प्रीति की बात।
5जो नहिं दृग-अँसुवन बरसावति, विरह जरावत गात।
6कह “कृपालु” बढ़ि जात प्रेम जब, कोउ न छुपाय सकात॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-इन आँखों में नित्य बरसात बनी रहती है। जब से श्यामसुन्दर ने विरह की आग लगा दी है तब से एक क्षण को भी यह बरसात नहीं जाती। सब पूछते हैं तुम्हारे पति, पुत्र, धन सब कुछ हैं, फिर भी दिन रात क्यों रोती रहती हो? अरी सखि! तू ही बता पर-पुरुष के प्यार की बात मैं किसी से कैसे कहूँ? और यदि आँखों से आँसू नहीं बहाती हूँ तो विरह की आग से शरीर जलता है। 'कृपालु' कहते हैं अरी सखि! जब प्रेम की मात्रा बढ़ जाती है तब उसे कोई भी किसी प्रकार भी नहीं छिपा सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 831-832