विरह-माधुरी · पद 149
यह मौन काल ली, का लली?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yaha mauna kāla lī, kā lalī?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1यह मौन काल ली, का लली?।
2अति उदास नहिं भूख प्यास कछु, योगिनि की गति का चली?।
3चितवनि, हँसनि, गवनि सब भूली, कोउ छलिया तोहिं का छली?।
4झर झर झर दृग झर जनु निर्झर, विरहागिनि महँ का जली?।
5यह काली करतूति लगति मोहिं, जाके काली कामली।
6मोहिं “कृपालु” क्यों नाहिं बतावति, हमहुँ सगी नहिं का अली॥
हिन्दी भावार्थ
विरहिणी किशोरी जी से एक अन्तरंग सखी कहती है कि हे किशोरी जी! क्या तुमने कल से मौन धारण कर लिया है? तुम अत्यन्त उदास रहती हो, तुमने खाना-पीना भी छोड़ दिया है। क्या योगाभ्यास कर रही हो? तुम्हारा देखना, हँसना चलना सब छूट सा गया है। क्या तुम्हें किसी ठग ने ठग लिया है? तुम्हारी आँखों से झरने की तरह दिन-रात आँसू निकला करते हैं। क्या तुम्हारे हृदय में विरह की आग लग गयी है? मुझे तो काली कमली वाले श्यामसुन्दर की ही यह करामात दिखती है। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि अरी सखि! तू मुझसे इस रहस्य को क्यों छिपाती है। क्या मैं तुम्हारी सगी नहीं हूँ?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 831