विरह-माधुरी · पद 148
मो सम कौन अभागिनि मात?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mo sama kauna abhāgini māta?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मो सम कौन अभागिनि मात?।
2जो प्राणाधिक श्याम-राम तजि, प्रान न तनु ते जात।
3राम लखन तजि तज्यो प्रान जो, धनि सो दशरथ तात।
4ऊखल-बंधन सरिस क्रूरता, करत रही दिन-रात।
5कपट प्रेम लखि तज्यो लाल जो, नहिं अचरज की बात।
6इमि “कृपालु” यशुमति अधीर ह्वै, मन ही मन पछतात॥
हिन्दी भावार्थ
अपने लाला के वियोग में विह्ल मैया यशोदा कहती हैं कि मेरे समान इस संसार में कौन दूसरी भाग्यहीन माँ होगी जो श्री कृष्ण एवं बलराम को प्राण से भी अधिक प्रिय कहती हुई उनके वियोग में प्राण न छोड़ सकी। वे पिता राजा दशरथ अत्यन्त भाग्यशाली थे जिन्होंने राम लक्ष्मण के वियोग। में अपने प्रेम का परिचय देते हुए प्राण छोड़ दिये। हाय! मैं अपने लाला के साथ ऊखल बंधन सरीखा सदा कठोर व्यवहार। क्यों किया करती थी? कदाचित मेरे प्रेम को कपटयुक्त समझ कर ही मेरे लाला ने मेरा परित्याग कर दिया है। यदि ऐसा है तब ठीक ही है, इसमें आश्चर्य ही क्या है? 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार यशोदा जी अपने लाला के वियोग से अत्यन्त ही अधीर होकर मन ही मन में पछता रही हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 830